शनिवार, मई 06, 2006

जुगलबन्दी-02


1.
नरगिस

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लहरा कर, सरसरा कर , झीने झीने पर्दो ने,
तेरे, नर्म गालोँ को जब आहिस्ता से छुआ होगा
मेरे दिल की धडकनोँ मेँ तेरी आवाज को पाया होगा
ना होशो ~ हवास मेरे, ना जजबोँ पे काबु रहा होगा
मेरी रुह ने, रोशनी मेँ तेरा जब, दीदार किया होगा !
तेरे आफताब से चेहरे की उस जादुगरी से बँध कर,
चुपके से, बहती हवा�"ँ ने,भी, इजहार किया होगा
फैल कर, पर्दोँ से लिपटी मेरी बाहोँ ने, फिर् , तेरे,
मासुम से चेहरे को, अपने आगोश मेँ, लिया होगा ..
तेरी आँखोँ मेँ बसे, महके हुए, सुरमे की कसम!
उसकी ठँडक मेँ बसे, तेरे, इश्को~ रहम ने,
मेरे जजबातोँ को, अपने पास बुलाया होगा
एक हठीली लट जो गिरी थी गालोँ पे,
उनसे उलझ कर मैँने कुछ �"र सुकुन पाया होगा
तु कहाँ है? तेरी तस्वीर से ये पुछता हूँ मैँ..
आई है मेरी रुह, तुझसे मिलने, तेरे वीरानोँ मैँ
बता दे राज, आज अपनी इस कहानी का,
रोती रही नरगिस क्युँ अपनी बेनुरी पे सदा ?
चमन मेँ पैदा हुआ, सुखन्वर, यदा ~ कदा !!
---------------------------------Lavanya Shah, Dated: Sun, 07 May 2006 19:34:59 -0000


2.

कैसे पलकें उठाऊँ मैं अपनी
आईना देख कर है शरमाया...
---------------------------------Devi Nangrani, Dated: Tue, 09 May 2006 17:50:55 -0000

3.

रात की उँगलियाँ
आँखों पे फिराता था क्यों
चाँद पानी की सतह
पर तैरता था क्यों
वो हसीन ख्वाब आँखों
में सोता था क्यों
जो तस्वीर सचमुच कहीं भी नहीं
उसकी याद में
शब भर रोता था क्यों

---------------------------------Pratyaksha Sinha, Dated: Thu, 10 May 2006 12:30:35 AM

4.

गज़ल: HusN hi Husn
---------------------------------
ऐ हुस्न तेरी शमा यूँ जलती रहे सदा
कैसे दूँ दाद हाथ को, जिसकी तू है शफा.१
सुँदर सी सुरमई तेरी आँखें जो देख ली
पलकें झपक सकी न मैं नज़रें उसे मिला.२
अँगडाइयां है लेता यूं तेरा जवाँ बदन
सिमटाव देखकर तेरा शरमाए आइना.३
पलकें झुकी ही जाती क्यों जब शीशा सामने?
वो बेमिसाल थी तेरी शरमाने की अदा.४
झुकती रही न उठ सकी, झुककर वो एक बार
है लाजवाब हुस्न तू, तेरी गज़ब अना या
सजदा करे ऐ हुस्न! तुझे मेरी ये वफा. ५
जीने की कुछ तो दे मुझे मोहलत ऐ मौत तू
देवी निभा रही सदा, अब तू भी तो निभा.६

---------------------------------Devi Nangrani, Dated: Thu, 11 May 2006 20:47:30 -0000

2 टिप्‍पणियां:

lavanya ने कहा…

नरगिस
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लहरा कर, सरसरा कर , झीने झीने पर्दो ने,
तेरे, नर्म गालोँ को जब आहिस्ता से छुआ होगा
मेरे दिल की धडकनोँ मेँ तेरी आवाज को पाया होगा
ना होशो ~ हवास मेरे, ना जजबोँ पे काबु रहा होगा
मेरी रुह ने, रोशनी मेँ तेरा जब, दीदार किया होगा !
तेरे आफताब से चेहरे की उस जादुगरी से बँध कर,
चुपके से, बहती हवाओँ ने,भी, इजहार किया होगा
फैल कर, पर्दोँ से लिपटी मेरी बाहोँ ने, फिर् , तेरे,
मासुम से चेहरे को, अपने आगोश मेँ, लिया होगा ..
तेरी आँखोँ मेँ बसे, महके हुए, सुरमे की कसम!
उसकी ठँडक मेँ बसे, तेरे, इश्को~ रहम ने,
मेरे जजबातोँ को, अपने पास बुलाया होगा
एक हठीली लट जो गिरी थी गालोँ पे,
उनसे उलझ कर मैँने कुछ और सुकुन पाया होगा
तु कहाँ है? तस्वीर से ये पुछता हूँ मैँ..
आई है मेरी रुह, तुझसे मिलने, तेरे वीरानोँ मैँ
बता दे राज, आज अपनी इस कहानी का,
रोती रही नरगिस क्युँ अपनी बेनुरी पे सदा ?
चमन मेँ पैदा हुआ, सुखन्वर, यदा ~ कदा !!
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
लावण्या

Pratyaksha ने कहा…

रात की उँगलियाँ
आँखों पे फिराता था क्यों
चाँद पानी की सतह
पर तैरता था क्यों
वो हसीन ख्वाब आँखों
में सोता था क्यों
जो तस्वीर सचमुच कहीं भी नहीं
उसकी याद में
शब भर रोता था क्यों